सार-भाव
तुकाराम (Tukaram) महाराष्ट्र के एक महान् संत और वारकरी संप्रदाय के चार श्रेष्ठ संतों (ज्ञानदेव आदि) में से अंतिम संत कवि थे। वे तत्कालीन भारत में चले रहे ‘आध्यात्मिक सूर्य ‘ की भाति जन-जन तक भक्ति का प्रसार किया। और उन्होंने ईर्ष्या, द्वेष, दम्भ, वैर-भाव से दूर इस भोले-भाले सन्त ने जनसाधारण को भक्ति तथा समय-समय पर सहज रूप से परिस्फुटित होने वाली ‘अभंग’ वाणी (शिष्यों द्वारा लिखे गए लगभग 4000 ‘अभंग’) से सीधा-सरल मार्ग सुझाया। उन्हें ‘तुकोबा’ भी कहा जाता है। संत तुकाराम जी के जन्म के समय पर विद्वानों मे मतभेद हैं, फिर भी ऐसा माना जाता है की उनका जन्म देहू नामक ग्राम में 1608 में माघ शुद्ध पंचमी (वसंत पंचमी) के दिन हुआ था।परमेश्वर प्राप्ति के लिये उत्कंठित तुकाराम को बाबा जी चैतन्य नामक साधु ने माघ शुद्ध 10 शके 1541 में ‘रामकृष्ण हरि‘ मंत्र का स्वप्न में उपदेश दिया। इस प्रकार उन्होंने सबको भक्ति का उपदेश दिया व भक्ति के कीर्तिमान संत श्री तुकाराम जी ने 1650 में, केवल 41 वर्ष की आयु में, उन्होंने फाल्गुन कृष्ण द्वितीया को सदेह वैकुंठ गमन किया।
Read in – English / हिन्दी/ मराठी
जीवनी : संत श्री तुकाराम जी महाराज
जन्म परिचय
संत तुकाराम जी के जन्म के समय पर विद्वानों मे मतभेद हैं, फिर भी ऐसा माना जाता है की उनका जन्म पूना में इन्द्रायणी नदी के तट पर बसे देहु नामक ग्राम में सन 1608 माघ शुद्ध पंचमी (वसंत पंचमी) के दिन हुआ था। इनकी बाल्यावस्था माता ‘कनकाई’ व पिता ‘बोल्होबा’ की देखरेख में अत्यंत दुलार के साथ व्यतीत हुई थी, उनका कुलनाम (सरनेम) ‘मोरे’ और उपनाम ‘अंबिले’ था। बचपन से ही तुकाराम महाराज में ईश्वर-भक्ति और करुणा का भाव विकसित हो गया था। तुकाराम महाराज के दो विवाह हुए। इनके 2 विवाह हुए ,पहला विवाह 13 वर्ष की आयु में रुक्मिणीबाई से हुआ। दूसरा विवाह 16 वर्ष की आयु में जिजाबाई (आवली) से हुआ। जिजाबाई से उन्हें तीन पुत्र— महादेव, विठ्ठल और नारायण—तथा तीन पुत्रियाँ—कशी, भागीरथी और गंगा—हुए।
वंशावली: तुकाराम महाराज की वंशावली इस प्रकार है: विश्वंभर → हरी → विठोबा → पदाजी → शंकर → कान्होबा → बोल्होबा और फिर तुकाराम महाराज। तुकाराम महाराज की माँ को सावजी, तुकाराम और कान्होबा नामक तीन बेटे हुए। कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, उनकी दो बेटियाँ भी थीं।

संत तुकाराम जी महाराज का जन्म स्थान
विपत्तियाँ
उनके जीवन के प्रारंभिक काल में ही अनेक संकट आए। तुकाराम जी सत्रह वर्ष के थे, तब उनके वात्सल्य मूर्ति पिता श्री बोल्होबा का स्वर्गवास हुआ, जिन्होंने तुकाराम जी को महाजनी का काम सिखाया था। वह दुःख कम होने से पहले ही अर्थात् पिता की मौत के एक वर्ष पश्चात् माता कनकाई का स्वर्गवास हुआ। तुकाराम जी पर दुःखों का पहाड टूट पड़ा। उसके बाद अठारह बरस की उम्र में ज्येष्ठ
बंधु सावजी की पत्नी (भावज) चल बसी। पहले से ही घर-गृहस्थी में सावजी का
ध्यान न था। पत्नी की मृत्यु से वे घर त्यागकर तीर्थयात्रा के लिए निकल गए। जो गए, वापस लौटे ही नहीं। परिवार के चार सदस्यों को उनका बिछोह सहना पड़ा। तुकाराम जी ने सब्र रखा, साल की अवस्था में सफलता से घर-गृहस्थी करने का प्रयास करने लगे। परंतु काल को यह भी मंजूर न था, एक ही वर्ष में स्थितियों ने प्रतिकूल रूप धारण किया, दक्खिन में बडा अकाल पड़ा। और 1629 ईस्वी अतिवृष्टि हुई,उसके बाद सन 1630 मे अकाल, और फिर सन 1631 मेअतिवृष्टि हुई। भीषण अकाल की चपेट में तुकाराम जी का कारोबार, गृहस्थी समूल नष्ट हुई। पहली पत्नी रुक्मिणीबाई को दमा की बीमारी थी। अकाल पड़ने के बाद उनकी पहली पत्नी और उनसे हुआ पुत्र ‘संतोबा’ दोनों का निधन हो गया। आमतौर पर अकाल की स्थिति साहूकार और व्यापारियों के लिए सुनहरा मौका होता है। चीजों का कृत्रिम अभाव निर्माण कर वे अपनी जेबें भरते हैं। पर तुकारामजी बहुत दयालु स्वभाव के थे, वे अपना दुःख, दुर्दशा भूलकर वे अकाल पीडितों की सेवा में, मदद में जुट गए।
तुकाराम महाराज का सरल स्वभाव

एक बार की घटना है,एक व्यक्ति, जो तुकाराम का कीर्तन सुनने उनकी सभा में प्रतिदिन आया करता था, एक दिन तुकाराम की भैंस ने उसके खेत को चर दिया । इस पर क्रोधित होकर उसने तुकाराम को न केवल गालियां दीं, वरन् कांटों वाली छड़ी लेकर बहुत पीटा । संध्या के समय जब वह कीर्तन में नहीं पहुंचा, तो तुकाराम उसे स्नेहपूर्वक लिवाने चले गये । वह उनके पैरों पर गिर पड़ा और क्षमायाचना करने लगा ।
ऐसी ही सहनशीलता का एक दूसरा उदाहरण यह मिलता है एक बार की घटना है, खेतों में गन्ने की फसल अच्छी हुई थी । तुकाराम गन्ना से लदी हुई बैलगाड़ी लेकर घर घुम रहे थे । रास्ते में बच्चे-बूढ़े जो भी मांगते, तुकाराम उन्हें देते चलते । घर तक पहुंचते-पहुंचते जब एक ही गन्ना बचा, तो जीजाई वह देखकर यह सोचकर दुखी हुई कि ऐसे में वह संसार कैसे चला पायेगी । क्रोध में आकर जीजाई ने गन्ना तुकारामजी की पीठ पर दे मारा । गन्ने के दो टुकड़े देखकर तुकाराम ने हंसते हुए जीजाई से कहा: ”ये लो, ईश्वर ने तुम्हारे और मेरे लिए गन्ने के दो बराबर टुकड़े कर दिये हैं”।
तुकाराम महाराज का आध्यात्मिक जीवन
अपनी दूसरी पत्नी के व्यवहार और पारिवारिक कलह से तंग आकर तुकाराम नारायणी नदी के उत्तर में ‘मानतीर्थ पर्वत’ पर जा बैठे और भागवत भजन करने लगे। इससे घबराकर पत्नी ने देवर को भेजकर इन्हें घर बुलवाया और अपने तरीके रहने की छूट दे दी। तुकाराम महाराज ने दुःख के समय वारकरी संप्रदाय के संतों की शिक्षाओं को आत्मसात किया। उनके मन में “विठ्ठल” नाम के प्रति श्रद्धा और अपनापन बढ़ता गया। तुकाराम महाराज ने विठ्ठल को केवल भगवान के रूप में नहीं, बल्कि अपने सखा, मित्र और जीवन के आधार के रूप में माना। उनके अभंगों में विठ्ठल से किया गया संवाद, रूठना-मनाना, करुण प्रार्थना और प्रेमभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
अभंग साहित्य: तुकाराम महाराज की आध्यात्मिक देन
तुकाराम जी के मुख से समय-समय पर सहज रूप से परिस्फुटित होने वाली ‘अभंग’ वाणी केअतिरिक्त इनकी अन्य कोई विशेष साहित्यिक कृति उपलब्ध नहीं है। अपने जीवन के उत्तरार्ध में इनके द्वारा गाए गए तथा उसी क्षण इनके शिष्यों
द्वारा लिखे गए लगभग 4000 ‘अभंग’ आज उपलब्ध हैं। इसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा।
कुछ लोग विरोध भी करने लगे। कहा जाता है कि रामेश्वर भट्ट नामक एक कन्नड़
ब्राह्मण ने इनसे कहा कि तुम ‘अभंग’ रचकर और कीर्तन करके लोगों को वैदिक
धर्म के विरुद्ध बहकाते हो। तुम यह काम बंद कर दो। उसने संत तुकाराम को देहू गांव से निकालने का भी हुक्म जारी करवा दिया। इस पर तुकाराम ने रामेश्वर भट्ट से जाकर कहा कि मैं तो विट्ठल जी की आज्ञा से कविता करता हूँ। आप कहते हैं तो मैं यह काम बंद कर दूँगा। यह कहते हुए उन्होंने स्वरचित अभंगों का बस्ता नदी में डुबा दिया। किन्तु 13 दिन बाद लोगों ने देखा कि जब तुकाराम ध्यान में बैठे थे, उनका बस्ता सूखा ही नदी के ऊपर तैर रहा है। यह सुनकर रामेश्वर भट्ट भी उनका शिष्य हो गया। लोग इनका पाठ करते हैं। इनकी रचनाओं में ‘ज्ञानेश्वरी’ और ‘एकनामी भागवत’ की छाप दिखाई देती है। काव्य की दृष्टि से भी ये रचनाएँ उत्कृष्ट कोटि की मानी जाती हैं। उनकी हृदयवेधकता मराठी भाषा में सर्वथा अद्वितीय है।बचपन में उन्होंने गेंद-बल्ला, हुंबरी, हुतूतू (कबड्डी), गिल्ली-डंडा जैसे खेल खेले होंगे। टिपरी, हमामा, फुगड़ी आदि खेल भी उन्होंने रुचि लेकर देखे होंगे। उन्होंने खेल पर आधारित कई सुंदर अभंग रचे हैं। तुकाराम महाराज की गाथा (संग्रह) में खेलों का जितना वैविध्य है, उतना किसी अन्य संत की गाथा में नहीं मिलता।
तुकाराम जी और छत्रपति शिवाजी
महाराष्ट्र के महान शासक शिवाजी तुकाराम के बड़े प्रशंसक थे। एक बार शिवाजी महाराज तुकाराम के दर्शन के लिए देहू आए, उन्होंने तुकाराम को एक बड़ी भेंट देने की पेशकश की, लेकिन तुकाराम ने उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। शिवाजी तुकाराम की स्तुतियों, गीतों और भजनों से इतने प्रभावित हुए कि क्षण भर के लिए उन्होंने अपना राज्य त्यागकर भजन करना और तुकाराम का अनुसरण करना चाहा, तुकाराम जी ने शिवाजी महाराज को उपदेश दिया:“आप राजा हैं। आपकी जिम्मेदारी प्रजा की रक्षा करना है। आप अपना कर्तव्य निभाइए और उसी में ईश्वर की भक्ति कीजिए। संसार त्यागने की कोई आवश्यकता नहीं है” , यही मेरी सरल और एकमात्र सलाह है।” शिवाजी प्रसन्न और संतुष्ट होकर अपने दरबार लौटे।
देहविसर्जन
तुकाराम के जीवन में अनेक अद्भुत घटनाएँ घटीं। उनकी प्रसिद्धि पूरे देश में फैल गई, परन्तु वे स्वयं इससे अप्रभावित रहे। उन्हें ठीक-ठीक पता था कि वे कब इस संसार से विदा होंगे। वे जीवन से ऊब गए थे और सोचने लगे कि उनका समय शरीर की सुख-सुविधाओं को पूरा करने में व्यर्थ व्यतीत हो रहा है, जबकि इसे कीर्तन, भजन और विठोबा की स्तुति में लगाना अधिक उचित होता। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि उन्हें शीघ्र ही अपने चरण कमलों में ले जाया जाए। तुकाराम के अंतिम समय की जानकारी के अनुसार, ४० वर्ष की आयु के बाद उन्हें संसार छोड़ने की इच्छा होने लगी। शके १५७१, फाल्गुन वद्य द्वितीया (हालांकि वा. सी. बेंद्रे के अनुसार यह तिथि फाल्गुन वद्य पंचमी है) (९ मार्च १६४९) (तुकाराम बीज, होली के बाद) एक नांदुरकी वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर सदेह (भावार्थ-शरीर ही ब्रह्मरूप हो गया ) विठ्ठल के धाम चले गए । निधन के समय उनके तीन बेटे (महादेव, विठोबा, नारायण) और तीन बेटियाँ (काशी, भागीरथी, गंगा) थीं।
अंतिम उपदेश
जब तुकाराम का अंत समय निकट आया, तो उन्होंने अपने मित्रों को बताया कि वे कुछ ही दिनों में चले जाएंगे। अपने प्रस्थान से एक रात पहले, तुकाराम ने एक कीर्तन किया जो कई मायनों में यादगार था। इसका विषय ‘हरिकथा’ था। तुकाराम ने कहा, “हरिकथा तीन पवित्र नदियों—ईश्वर, भक्त और उनके नाम—के संगम के समान है, इसे सुनने से सारे पाप भस्म हो जाते हैं और मनुष्य पवित्र हो जाता है। यहाँ तक कि आस-पास पड़े कंकड़-पत्थर भी पवित्र और पूजनीय हो जाते हैं। अगली सुबह तुकाराम ने अपनी पत्नी से कहा, “तुम्हें जल्द ही नारायण नाम का पुत्र होगा और वह तुम्हें प्रसन्न रखेगा। तुमने मेरे दिनों को सुखमय बनाया। मैं तुम्हारी कृपा का कभी भी ऋण नहीं चुका पाऊंगा।” अपनी मृत्यु निकट आने की खबर सुनकर, पूरे गाँव के लोग उनके चारों ओर एकत्रित हो गए और उन्होंने उन्हें इस प्रकार उपदेश दिया:
आप सभी पारिवारिक जीवन की जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी, पांडुरंगा को कभी न भूलें। उनकी आराधना और स्तुति करना कभी न भूलें। पंढरपुर आपके बहुत निकट है। यह इस धरती पर वैकुंठ है। वहां जाकर भगवान की आराधना करें। मेरा अनुभव है कि मृत्यु के समय केवल भगवान का नाम
ही आपकी रक्षा करेगा। आप सभी ने इतने लंबे समय तक मुझे अपने बीच सुरक्षित
रखा और मेरा पालन-पोषण किया। मैं आपका एहसान कभी नहीं चुका सकता और मैं आपका बहुत आभारी हूं। मैं विठोबा से प्रार्थना करूंगा कि वे आप सभी को
आशीर्वाद दें और सदैव अपनी शरण मे रखे। यह आप सभी को मेरा अलविदा है और यही मेरा आप सभी के लिए उपदेश है। मैं आपके समक्ष नतमस्तक होकर नम्रतापूर्वक आपसे विनती करता हूं कि भगवान का नाम कभी न भूलें। हमेशा भगवान नारायण का कीर्तन और भजन करें। अपने भौतिक कल्याण के
बारे में चिंतित न हों। भगवान इसकी देखभाल करेंगे। यह सब क्षणभंगुर है।
भगवान का नाम शाश्वत है। केवल उसी पर भरोसा रखें, भगवान की स्तुति करते
रहें। रामकृष्ण हरि का जप करें और वे हमेशा आपकी रक्षा करेंगे। यह मेरी
आपसे आखिरी गुजारिश और सलाह है।”